हिन्दी पत्रकारिता के शिखर पुरूष
डा. राघवेन्द्र बाजपेयी व उपेन्द्र बाजपेयी से
हिन्दी पत्रकारिता के शिखर पुरूष
डा. राघवेन्द्र बाजपेयी व उपेन्द्र बाजपेयी से
के विक्रम राव
हिन्दी पत्रकारिता के शिखर पुरूष संपादकाचार्य पंडित अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने न सिर्फ पत्रकारिता की गौरवशाली परम्परा स्थापित की बल्कि हिन्दी में यशस्वी पत्रकारों की एक अच्छी पीढ़ी भी तैयार कर दी। जिसने इस क्रम को आगे बढ़ाया। काशी के दैनिक ‘आज’ के संपादक का कार्यभार संभालने से पहले श्री बाबूराव विष्णु पराड़कर वाजपेयी जी के निमंत्रण पर भारतमित्र के संयुक्त संपादक रह चुके थे। पटने से प्रकाशित दैनिक आर्यावत्र्त के संपादक पंडित श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार, दैनिक विश्वमित्र के संस्थापक-संपादक श्री मूलचन्द अग्रवाल, आचार्य बद्रीनाथ वर्मा, डा. हेमचन्द्र जोशी, श्री माता सेवक पाठक, श्री भगवान् दास हालना, श्री पारस नाथ सिंह, श्री द्वारिका प्रसाद मिश्र, श्री रमाशंकर अवस्थी आदि अनेक पत्रकारों को वाजपेयी जी के सान्निध्य का अवसर मिला और उन्होंने आगे चलकर अपनी अपनी जगह नाम कमाया। पारस नाथ सिंह बाद में हिन्दुस्तान टाइम्स के प्रबंध-संपादक हुए और पत्र की प्रसिद्धि में उनका विशेष योगदान हुआ। रमाशंकर अवस्थी ने कानपुर से दैनिक ”वत्र्तमान“ निकाला था।
दैनिकांे का पथप्रदर्शक ”भारतमित्र“
यद्यपि भारतमित्र से पहले कुछ हिन्दी दैनिक निकल चुके थे, किंतु वे अल्पजीवी रहे। साथ ही, उनमें से अधिकांश किसी न किसी धार्मिक संप्रदाय के पक्षधर थे। साप्ताहिक ”भारतमित्र“ के संपादक का कार्यभार संभालने के बाद वाजपेयी जी ने उसे सन् 1911 में दैनिक किया। सन् 1911 में दिल्ली दरबार होना था। जिसमें ब्रिटेन के सम्राट आ रहे थे, यह विचार कर कि यक ऐसी ऐतिहासिक घटना होगी जिस में जनता को प्रत्येक दिन समाचार जानने की इच्छा होगी वाजपेयी जी ने भारतमित्र को दैनिक करने का निर्णय किया। इसके लिए दिल्ली से तार द्वारा विशेष समाचार मंगाने की व्यवस्था भी कर ली। ब्रिटिश सम्राट के वापस जाने पर भारतमित्र का दैनिक संस्करण 17 जनवरी को इस सूचना के साथ बन्द कर दिया गया कि मार्च 1912 से यह बराबर दैनिक के रूप में प्रकाशित होगा। इस बीच उसकी लोकप्रियता को देखकर पूरी तैयारी के साथ प्रकाशित हुआ और दैनिक के रूप में 1935 तक चलता रहा। भारतमित्र के दैनिक संस्करण की लोकप्रियता ने कई अन्य दैनिकों को प्रोत्साहित किया। सन् 1914 से 1917 के बीच चार नये पत्र निकलेः कलकत्ते से “कलकत्ता समाचार“, काशी से ”भारत जीवन“, इलाहाबाद से ”दैनिक अभ्युदय“ और कलकत्ते से ही 1917 में ”दैनिक विश्वमित्र“। इनमं श्री मूलचन्द अग्रवाल के अधीन ”विश्वमित्र“ सबसे अधिक साधन संपन्न था। कालान्तर में उसके पांच संस्करण विभिन्न क्षेत्रांे से निकले।
भारतमित्र का स्वामित्व वाजपेयी जी का नहीं था। सन् 1919 में उन्होंने उससे अलग होने का निश्चय कर लिया। इसका एक कारण था दिन रात परिश्रम के कारण उनका स्वास्थ्य विगड़ गया था। दूसरा कारण था वाजपेयी जी के उग्र लेखों और उनकी टिप्पणियों से प्रेस पर दबाव पड़ रहा था। और दैनिकों को डर था कि कहीं प्रेस पर ही ताला न पड़ जाय। यह परिस्थिति उस समय भी उत्पन्न हुई थी। जब वाजपेयी जी का मासिक ”नृसिंह“ साल भर ही चलकर बन्द हो गया, यद्यपि इस अवधि में भी उसने बड़ा नाम कमाया। मासिक का पूरा काम वे स्वयं करते थे। उन्हीं के शब्दों में ”जूता सिलाई सेचंडी पाठ तक (बंगला की एक कहावत)। साधनों की कमी तो थी ही, जिस प्रेस में छपता था, उसे मालिक ने कहना शुरू किया कि आप किसी और प्रेस की तलाश कर लें।
इसके बाद उनकोंा यह बात लगातार कुरेदती रही कि हिन्दी का एकऐसा पत्र हो जो सचमुच समाचारपत्र कहला सके। हय इच्छा अनायास ही तब पूरी हुई जब साप्ताहिक भारतमित्र के मालिक एक अच्छे संपादक की तलाश में थे। हमारे पितामह पं. कन्दर्प नारायण वाजपेयी परिवार चलाने के लिए गल्ले का व्यापार करते थे। साथ ही, उन्हें ज्योतिष का अच्छा ज्ञान था जिससे उनके परिचितों और भक्तों का काफी बड़ा दायरा हो गया। भारतमित्र के मालिक भी उनमें से एक थे। उनसे किसी ने कहा कि यदि अम्बिका प्रसाद वाजपेयी संपादक बनने को तैयार हो जायं तो अखबार चल निकलेगा। यह सेाचकर कि वाजपेयी होने के नाते शायद कन्दर्प नारायण जी बता सकें कि अम्बिका प्रसाद कहां मिलेंगे, जब कन्दर्प नारायण जी से भारतमित्र के मालिक ने पूछा तो वे हंसने लगे। यह मालूम होने पर कि वे कन्दर्प नारायण जी के ही पुत्र हैं तो उन्होंने हमारे पितामह के चरण पकड़ लिये और कहा कि उन्हें हमारे लिए राजी कर लीजिये। बातचीत के दौरान पिताजी की एक ही शर्त थी। कि संपादकीय नीतिरीति के बारे में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। भारतमित्र के मालिक ने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। भारतमित्र की लोकप्रियता, खासकर उसके दैनिक होेने के बाद उसकी प्रशंसा से मालिक मगन रहते थे। किंतु सन् 1919 आते आते परस्पर कुछ दरार दिखायी देने लगी। वाजपेयी जी ने इस्तीफा दे दिया।
उस समय के श्रेष्ठ पत्रकारों में पंडित लक्ष्मण नारायण गर्दें जब संपादक होने को राजी हुए तो उन्होंने स्वयं पिता जी से आग्रह किया कि आप संपादक बने रहें, मैं आपके अधीन काम करने को तैयार हूं। उस समय हिन्दी पत्रकारों की वृहत्रयी में अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, बाबूराव विष्णु पराड़कर जी, फिर गर्दे जी। इन सबके आपसी संबंध बहुत मधुर थे। गर्दे जी को संभवतः यही जानकारी थी कि वाजपेयी जी स्वास्थ्य ठीक न होेने से त्यागपत्र देरहे है। गर्दे जी किसी हदतक धर्म-प्रधान दृष्टिकोण वाले थे। उनकी राजनीतिक टिप्पणियों में भी वाजपेयी जी वाली उग्र लेखनी नहीं नज़र आती थी।
इधर, वाजपेयी जी तत्काल कोई दूसरे पत्र के साथ जुड़ना नहीं चाहते थे। फिर भी, अपने मित्रों और प्रशंसकों के दबाव और उनकी सहायता से उन्होंने एक कंपनी बनाना स्वीकार कर लिया। जिसका नामकरण हुआ ”इंडियन नेशनल पब्लिशर्स लिमिटेड। संपादक होने के अलावा इसके हुए अम्बिका प्रसाद वाजपेयी। वाजपेयी जी की दिलचस्पी कांग्रेस की गतिविधियों में हो चुकी थी। वे कांग्रेस महासमिति के सदस्य हुए और कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन की स्वागत समिति के उपाध्यक्ष। यह भी एक कारण रहा होगा कि ”इंडियन नेशनल कांग्रेस“ का ढर्रेपर उन्होंने अपनी कंपनी का नाम ”इंडियन नेशनल पब्लिशर्स“ रखा। पत्र का नाम रखा गया ”स्वतंत्र“।
विश्वयुद्ध की भविष्यवाणी
वाजपेयी जी की इच्छा शुरू से थी कि समाचार पत्र सचमुच हर दृष्टि से समाचारपत्र होना चाहिए और वह निर्भीक और स्वतंत्र होना चाहिए। दैनिक भारतमित्र में उनका पराक्रम बहुत कुछ फलीभूत हुआ। ”स्वतंत्र“ ने उसे और साकार किया। ”कीर्तिमान“ पुस्तक में श्री जगदीश चतुर्वेदी ने वाजपेयी जी पर लिखे अपने लेख में वाजपेयी जी की सूझबूझ और उनके व्यापक दृष्टिकोण के बारे में जो लिखा है, उसका एक अंश यहां उदधृत किया जा रहा हैं
”वाजपेयी जी ने एकसमाचार-प्रधान हिन्दी दैनिक का श्रीगणेश किया था। उनकी कोशिश थी कि अपने पाठकों को संसार के नये-नये समाचारों के बारें मंे सूचित ही नहीं करेें, उन्हं प्रशिक्षित भी करें। इसलिए जब प्रथम विश्वयुद्ध प्रारंभ हुआ तो वाजपेयी जी ने महासमर की गति- नाम से एक दैनिक कालम चलाया जिसमं वे अध्ययन कर पाठकों को यह भविष्यवाणी भ्ीा करते थे कि अब दोनेां सेनाओं की अगली चाल क्या हेागी। युद्ध का उन्होंने विश्व राजनीति के संदर्भ मं इतना सूक्ष्म अध्ययन कर लिया था कि 1913 में ही उन्होंने भविष्यवाणी कर दी थी कि महायुद्ध होने वाला है।“ महायुद्ध सन् 1914 से शुरू होकर 1918 में समाप्त हुआ।
पत्रकारिता के संबंध में वाजपेयी जी के दृष्टिकोण की झलक भारतमित्र और स्वतंत्र के अलावा ”नृसिंह“ से भी मिलती है। उन्होंने लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और कई अन्य विभूतियों के बारें में लेखों और कविताओं का प्रकाशन किया। ”नृसिंह“ उनका पहला निजी पत्र था और मासिक होते हुए बहुत लोकप्रिय हुआ। राजनीति के अलावा राष्ट्र भाषा तथा अन्य सामाजिक विषयों पर भी नृसिंह में लेख छपे।
ग्रन्थकार
वाजपेयी जी ने पत्रकारिता के अलावा भी कई विषयों पर पुस्तकें लिखीं। कुछ पुस्तकों के नाम हैंः हिन्दुओं की राजकल्पना, हिन्दू राज्य शास्त्र, भारतीय शासन पद्धति (दो खंड़ों मंे) हिन्दी पर फ़ारसी का प्रभाव, हिन्दी कौमुदी, अभिनव हिन्दी व्याकरण, हिन्दुस्तानी मुहावरे, अंग्रेजी, की वर्तनी और उच्चारण, अमेरिका और अमेरिकन, श्राद्ध प्रकाश। उनकी पुस्तक समाचार पत्र कला अनेक विश्वविद्यालयोंा के पत्रकारिता पाठयक्रम में है। यह पुस्तक पुरी हो चुकी थी जिसे उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने प्रकाशित किया किन्तु इसे प्रकाशित रूप में वाजपेयी जी नहीं देख सके क्योंकि यह उनके देहांत के कुछ दिन बाद ही छपकर आयी।
हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष
पत्रकारिता में अपना अमूल्य स्थान बनाने वाले वाजपेयी जी कुछ अन्य शीर्ष संपादकों की तरह ”सम्पादकीय“ कहलाये। हिन्दी साहित्य सम्मेलन का जो अधिवेशन 1939 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा के प्रांगण में हुआ उसके लिए वे अध्यक्ष निर्वाचित हुए। महामना मदन मोहन मालवीय उसके स्वागताध्यक्ष थे। सम्मेलन के अंतर्गत विभिन्न परिषदों के अध्यक्ष थेः राष्ट्र भाषा परिषदः देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद, दर्शन परिषदः डा. भगवान् दास, साहित्य परिषदः सूर्यकांत त्रिपाठी ”निराला“। हिन्दी जगत् के जितने कीर्तिमान इस अधिवेशन में एकत्र हुए उतने किसी अन्य अधिवेशन में न पहले न कभी बाद में। सम्मेलन ने वाजपेयी जी को ”साहित्य वाचस्पति“ की उपाधि से विभूषित किया।
पारिवारिक परंपरा
30 दिसंबर 1880 को पुराने कानपुर में जन्मग्रहण करने वाले अम्बिका प्रसाद वाजपेयी पत्रकारिता और साहित्य की अमूल्य धरोहर आने वाली पीढ़ियों को सौंप कर लखनऊ में 21 मार्च 1968 को दिवंगत हुए। वे नवंबर तक लिखते रहे।
वाजपेयी जी का जन्म लखनऊ के वाजपेयियों के उस परिवार में हुआ था जो अपने परम्परागत शास्त्र ज्ञान, सरल, किन्तु कठोर-अनुशासित जीवन, कर्मकाण्ड के ज्ञान-विधान और प्रयोग के लिए प्रसिद्ध रह चुका था। उसके पितामह रामचन्द्र जी अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह के मंत्रिमंडल में धर्माध्यक्ष अर्थात् हिन्दू धर्म और विधि के प्रमुख व्याख्याता-निर्णयकर्ता थे। पितामह की 1856 में जब मृत्यु हुई वाजपेयी जी के पिता कन्दर्पनारायण दस वर्ष के थे। सामन्ती सम्पन्नता स विपन्नता वाले वाजपेयी परिवार को आर्थिक चुनौतियों से जूझना पड़ा। फलतः सम्पन्न विद्वान एवं शक्तिशाली प्रशासकीय मंत्री के पुत्र को जीविका जुटाने के लिए व्यावसायिक पद्धति सीखनी पड़ी। कन्दर्पनारायण जी कलकत्ता चले गये।
वहां उन्होंने गल्ले का व्यापार किया जो अच्छा चल निकला। शुरू-शुरू में पूरा परिवार उसी से चला। कलकत्ते से बनारस और बनारस से 1946 में लखनऊ पहुंच जाने के बाद लखनऊ के साहित्यकारों, विद्वानों मंे सर्वश्री अमृत लाल नागर, यशपाल, भगवती चरण वर्मा, श्रीनारायण चतुर्वेदी इत्यादि उन्हं बहुत मानते थे। वाजपेयी जी के जन्मदिन पर उनके नज़रबाग (लखनऊ) स्थित निवास स्थान पर इक्ट्ठा होने वाले साहित्यकारों, पत्रकारों का अद्भुत संगत दोने को मिलता था। सभी मिल जुल कर अपने वयोवृद्ध वाजपेयी जी के साथ देश-विदेश, राजनीति, भाषा के भविष्य आदि विषयों पर गर्मजोशी से चर्चा करते थे।
वाजपेयी जी स्मरणशक्ति के अद्भुत धनी थे। अपने जीवन के अस्सी वर्षों का घटना क्रम उनकी वाणी से शब्दों के चलचित्र की भांति प्रकट होता था। उनके संस्मरण पूर्णतया स्मरण शक्ति का प्रतिफलन थे। उनके समकालीन उद्भट विद्वानों और अनुपम नेताओं में लोकमान्य को वे अपना राजनीतिक गुरू मानते थे। गांधीजी से कभी कभी मतभेद होने पर भी वे गांधीजी के सत्याग्रह आंदोलन में शामिल हुए और जेल गये।
एक दिन सन् 1952 की कड़ी दोपहर में दो महानुभाव पधारे, दोनों वाजपेयी जी के प्रति अत्यंत श्रद्धावान। एक थे बलभद्र मिश्र इलाहाबाद के दैनिक ”भारत“ के भूतपूर्व संपादक जो उत्तर प्रदेश सूचना विभाग की डिप्टी डाइरेक्टर पद पर थे। दूसरे, दैनिक ”स्वतंत्र भारत“ (लखनऊ) के संपादक अशोक जी। वे आये थे मुख्यमंत्री पं. गोविन्द वल्लभ पंत का एक संदेश लेकर। पिताजी से उन्होंने कहा कि संविधान में व्यवस्था है कि विशिषट वर्गों से कुल 12 व्यक्तियों को विधान परिषद में मनोनीत किया जाय। उसके लिए आपकी स्वीकृति चाहिये। उन दिनों वाजपेयी जी के कई सरकार-विरोधी लेख अखबारों में छप रहे थे।
”तो यह मुझे खरीदने का प्रस्ताव है। मैं इसके लिए तैयार नहीं हूँ“। दोनों ने कहा नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है। आप जैसा चाहें लिखते रहें। सरकार की ओर से आश्वस्त करने के लिए उन दोनों ने कहा ”दरअसल, संपूर्णानन्द जी का ब़ा मन है कि विधान परिषद के प्रथम मनोनीत सदस्यों में आपका नाम हो।“ यह मालूम था कि वाजपेयी जी और संपूर्णानन्द जी में परस्पर बहुत मान-सम्मान है। उन्हांेने कहा कि मुझे विचार करने के लिए कुछ समय दीजिये।
बलभद्र जी और अशोक जी ने कहा कि ग्यारह सदस्यों की स्वीकृत्ति मिल गयी है। मंत्रिमंडल की बैठक चल रही है। बस, आपकी स्वीकृति मिल जाने से आज शाम को सब नामों की घोषणा हो जायगी। इसे और पुख्ता करने के लिए उन्होंने कहा कि ग्यारह सदस्य जो ”हां“ कर चुके हैं, उनमें श्रीमती महादेवी वर्मा भी हैं। वाजपेयी जी ने भी ”हां“ कर दिया। इन दोनों से पंतजी ने कह रखा था कि वाजपेयी का उत्तर देने के लिए आप मंत्रिमंडल के बगल वाले कमरे मंे आकर मुझे बुला लीजियेगा। उसी दिन बारहों नामों की घोषणा हो गयी। पंतजी को किसी प्रकार का भ्रम न रहे, इसलिए दूसरे दिन वाजपेयी जी ने पंतजी को एक पत्र धन्यवाद देते हुए लिखा कि आपने तो वह कहावत चरितार्थ कर दी ”बैरी नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय“। फिर भी कहीं कोई शंका न रहे, इसलिए अपनी सदस्यता के पूरे छ वर्ष वे किसी दल में शामिल नहीं हुए और विरोधी पक्ष की ओर ही बैठते हे। पंत जी भी एक ही राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने वाजपेयी के पत्र के उत्तर में जो लिखा उसमें ”बैरी“ के प्रसंग की कोई चर्चा नहीं। अवश्य ही, उसका एक वाक्य इस प्रकार था आपको विधान परिषद में देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई।